They like to read my Life

Friday, September 30, 2011

शोएब पर दखलंदाज़ी

शोएब अख्तर हमेशा विवादों में रहते हैं या ये कहना ठीक रहेगा के विवाद हमेशा अख्तर को घेरे रहते हैं .हाल ही में अपनी नयी किताब का प्रचार करने के लिए सचिन तेंदुलकर,वसीम अकरम,शाहरुख़ खान और ललित मोदी पर भी कुछ ऐसा लिखा हैं के जिससे किताब को बिकने में सहायता मिले .
इस विषय पर मेरी दखलंदाज़ी इस लिंक पर देखिये 
http://www.dakhalandazi.com/2011/09/controversial.html


Tuesday, September 27, 2011

कैसा ये इश्क हैं

इश्क क्या हैं  कहते हैं "एक आग का दरिया हैं और डूब के जाना हैं ".सच पूछे तो इश्क यही हैं .हर मोड़ पर परेशानी हैं पर इन परेशानियो से पार पा कर जो सुख मिलता हैं .उसका नशा ही अलग होता हैं .खेर मैं यहाँ आज इश्क के दो अलग-अलग पहलु बताना चाहता हूँ .
हमें बचपन से सिखाया जाता हैं के हमें सबसे हिलमिल कर रहना चाहिए .सबसे प्यार करो किसी से कोई गिला शिकवा न रखो .बचपन में जब हम झगड़ते थे ,हमारे माता पिता कहते थे बेटा लड़ाई ना करो सबसे प्रेम से रहो .
इसी तरह की बातें सुनते सुनते जब हम बड़े हो जाते हैं .तब हमें इश्क होता हैं .फिर हर तरह की मुश्किल को हम सहने को तैयार रहते हैं  और उस वक़्त हमारे माता पिता हमारे इश्क का विरोध करते हैं .जो समाज हमेशा मिलजुल कर रहने के गीत गाता था वो अचानक हमारे इश्क के खिलाफ हो जाता हैं .बात सिर्फ इतनी सी हैं के बचपन में जब हमें कहा जाता हैं सबसे मिलकर रहो ,प्रेम से रहो तो फिर जवानी में उस इश्क का विरोध क्यों होता हैं .खेर ये एक पहलु था जो की बच्चो की तरफ से था .

आइये एक और पहलु की बात करते हैं जिसमे बच्चे खुद गलत होते हैं .

इश्क करना बुरी बात नहीं हैं ,परन्तु इस ज़माने में सिर्फ इश्क से किसी का पेट नहीं भरता  हैं .आजकल के बच्चे अपना भविष्य बाद में बनाते हैं .इश्क पहले करते हैं .फिर जिद करते हैं .माना इश्क होता नहीं हो जाता हैं .परन्तु इश्क के बाद जब आप उस हमसफ़र के साथ जिंदगी बिताने का फैसला कर लेते हो तो क्या ये सोचते हो के आप दोनों इतने सक्ष्म हो के अब अपना गुजारा कर लोगे और शायद यही कारण हैं के माता पिता इश्क का विरोध करते हैं .अगर आप और आपका हमसफ़र अपने पैरो पर खड़ा हो जाये तो कई सारे माता पिता आपके इश्क का विरोध नहीं करेंगे ,हमें ये समझना चाहिए के पश्चिम में जैसे ही बच्चा १२-१३ साल का होता हैं ,उसे बोल दिया जाता हैं के अब वो कोई काम धंधा भी करे पढाई के साथ ,ताकि कम से कम अपना खर्च भी निकल ले लेकिन ये हमारे यहाँ नहीं हैं .इसीलिए पश्चिम में इश्क का विरोध नहीं होता हैं .खेर वहा विरोध ना होने के और भी कारण हैं .

इश्क खुदा की इबादत  हैं पर इबादत से किसी को या अपने आप को भी ठेस ना पहुचे ये हमेशा ध्यान रखना चाहिए .
अंत में फिल्म "मेरे ब्रदर की दुल्हन " का ये गीत याद आता हैं "कैसा ये इश्क हैं ......अजब सा रिस्क हैं "

Monday, September 19, 2011

खवाहिशे

हैं हुस्न का जलवा तेरा
तू हैं एक ख्याल मेरा

जब वो बारिश की बुँदे ,
तेरी लटो को भिगोती हुई 
तेरे लबो तक आती हैं 
मेरी धड़कन बढ़ा देती हैं 

वो तेरे तीखे नैना ,
चाहते हैं मुझसे कुछ कहना 
लब बोलना नही चाहते हैं 
पर शब्द गिरने को हैं बेक़रार 
बस एक और लबो का सहारा मांगते हैं 

हर चाहत तेरी पूरी कर दूंगा ,
तेरी मोहब्बत को अपनी जिंदगी कर दूंगा ,
हमदम तू हैं साँसों में बसी 
तुझे दो जिस्म एक जान बना दूंगा 

तेरी जुल्फों सवार कर 
होठो से वो बारिश की बुँदे पी लूँगा  
(चिराग )

Friday, September 16, 2011

दखलंदाज़ी जारी रहे

नमस्कार दोस्तों सबसे पहले तो माफ़ी चाहता हूँ काफी दिनों बाद कुछ लिख पा रहा हूँ .थोड़ी व्स्त्ता के चलते कई दिनों से कुछ नही लिखा मैंने ,हाल ही में एक ऑनलाइन मैगजीन पर लिख रहा हूँ .वहा का स्पोर्ट्स एडिटर बन गया हूँ .मैगजीन का नाम हैं "दखलंदाज़ी ".आप नीचे दी गई लिंक पर जा कर मेरे लिखे हुए लेख पढ़ सकते हैं ,जो की क्रिकेट के बारे में हैं .उम्मीद करता हूँ आप सभी को मेरे लेख पसंद आयेंगे और अब इस ब्लॉग पर बराबर लिखता रहूँगा .
                       http://www.dakhalandazi.com/search/label/cricket
धन्यवाद  .